
सिल्वियो नई दिल्ली 2003 में आए थे। तब प्रधानमंत्री थे। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई से भेंट की थी। भारत-इटली व्यापार पर चर्चा भी हुई। दुभाषिया के माध्यम से बातें होती रहीं। फिर यह इतालवी प्रधानमंत्री लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (कांग्रेस पार्टी) श्रीमती सोनिया माइनों गांधी से भी उनके 10 जनपथ आवास पर मिले थे। मगर वहां दुभाषिये उपस्थिति नहीं थे। सोनिया और सिल्वियो अपनी मातृभाषा में बोले। इतालवी जुबां में। मीडिया को तब याद रहा कि एक अन्य गौरतलब इतालवी भी हो चुका है। तब 10 जनपथ में आता जाता रहता था। नाम था ओतावियो क्वात्रोची। बोफोर्सवाला। उससे रिश्तों के कारण राजीव-कांग्रेस के हाथों सत्ता छूट गई। लोकसभा चुनाव हार गये। इस सिल्वियो तथा उस ओतावियो मे कोई संबंध नहीं है। बस दोनों इतालवी रहे।
सिल्वियो बर्लुस्कोनी पूरा जीवन जिये, 86 वर्ष तक। उनकी छवि प्लेबॉय की थी। दिलफेंक नेता। अपने शोक संदेश में श्रीमती मेलोनी ने कहा : “बर्लुस्कोनी एक योद्धा थे। वह एक ऐसे व्यक्ति थे जो अपने विश्वासों की रक्षा करने से डरते नहीं थे। यह निश्चित रूप से साहस और दृढ़ संकल्प था जिसने उन्हें इटली के इतिहास में सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक बना दिया।” उनके गठबंधन पार्टी के अन्य नेता माटेओ साल्विनी ने कहा : “आज इटली ने एक महान नेता को खो दिया।” पूर्व प्रधानमंत्री माटेओ रेन्ज़ी ने कहा : “उन्होंने इतिहास रचा, भले ही वह विवादस्पद रहे थे।” उन्होंने कहा : “आज हर किसी को यह स्वीकार करना चाहिए कि राजनीतिक, आर्थिक, खेल और टेलीविजन जीवन पर उनका प्रभाव अभूतपूर्व था।” केंद्रीय लेफ्ट विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता एली श्लेन ने कहा कि बर्लुस्कोनी की मृत्यु “एक युग के अंत का प्रतीक है।”
बर्लुस्कोनी इटली के सबसे बड़े कमर्शियल ब्रॉडकास्टर मीडियासेट के मालिक थे। बचपन मुफलिसी में बीता। अपनी पढ़ाई के लिए पैसे कमाने के लिए वे एक क्रूज जहाज चलाया करते थे। धोखाधड़ी का दोषी 2012 में ठहराये गये तो चार साल जेल की सजा सुनाई गई थी। टैक्स बचाने के लिए फिल्म वितरण अधिकार की कीमत को जान-बूझकर कर बढ़ाने का उन्हें दोषी पाया गया था। उनकी “फोर्ज इटली” पार्टी (इटली आगे बढ़ो) को गत आम चुनाव मे आठ प्रतिशत वोट मिला और वे सरकार मे शामिल हैं। सबसे घृणित आरोप तो उन पर लगा था यौन संबंध बनाने के लिए। एक मोरक्कन डांसर को पैसे देने का। उन्हें अपराधी ठहराया गया था। सात साल की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, अपील पर वह दोषी नहीं करार दिए गए। उनके बरी होने के बाद आरोपों को खत्म कर दिया गया।
एक समानता इस रोमन मीडिया मुगल और उसके भारतीय हमराहियों में झलकती है। वे सब कानून को लचर साबित कर देते हैं। अदालते भी लाचार हैं इन मीडिया मालिकों के सामने। हम संगठित यूनियन वाले असहाय हैं।