हाई कोर्ट जज एक संवैधानिक पद है. इनकी नियुक्ति एक तय प्रक्रिया के तहत होती है. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जज और सरकार की सहमति के बाद इन्हें नियुक्त किया जाता है. भ्रष्टाचार से बचने और न्यायालय की स्वतंत्रता के लिए ये ज़रूरी है कि जजों का वेतन पर्याप्त हो. सातवें वेतन आयोग के तहत उनकी मासिक सैलरी 2.25 लाख रुपए होती है, और ऑफिस के काम-काज के लिए 27 हज़ार रुपए मासिक भत्ता भी मिलता है. हाई कोर्ट के न्यायाधीश को रहने के लिए एक सरकारी आवास दिया जाता है. और अगर वे सरकारी घर ना लें, तो किराए के लिए अलग से पैसे मिलते हैं. इस घर के रखरखाव के पैसे सरकार देती है. इन घरों को एक सीमा तक बिजली और पानी मुफ्त मिलता है. और फर्नीचर के लिए 6 लाख तक की रकम मिलती है. साथ ही उन्हें एक गाड़ी दी जाती है और हर महीने दो सौ लीटर पेट्रोल लेने की अनुमति होती है. इसके अलावा चिकित्सा की सुविधा, ड्राइवर और नौकरों के लिए भत्ते का भी प्रावधान है.
जज अपना काम निडरता से कर सके इसलिए संविधान में उन्हें कुछ सुरक्षाएँ दी गई है. उच्च न्यायपालिका यानी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को सिर्फ़ महाभियोग की प्रक्रिया के ज़रिए ही हटाया जा सकता है. महाभियोग की यह प्रक्रिया लंबी होती है. अगर लोक सभा के सौ सांसद या राज्य सभा के पचास सांसद जज को हटाने का प्रस्ताव दें, तो फिर सदन के अध्यक्ष या सभापति उसको स्वीकार कर सकते हैं. इस प्रस्ताव के स्वीकार होने के बाद तीन सदस्यों की समिति इस मामले की जांच करती है और एक रिपोर्ट सदन को सौंपती है. अगर समिति ये पाती है कि जज के ख़िलाफ़ आरोप बेबुनियाद हैं, तो मामला वहीं ख़त्म हो जाता. अगर समिति जज को दोषी पाती है तो फिर इसकी चर्चा दोनों सदनों में होती है और इसपर वोटिंग होती है.
अगर संसद के दोनों सदन में विशेष बहुमत से जज को हटाने के प्रस्ताव को स्वीकार किया जाए तो ये प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास जाता है, जो जज को हटाने का आदेश देते हैं. आज तक भारत में किसी भी जज को इस प्रकार से हटाया नहीं गया है, हालांकि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कम से कम छह जजों के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव लाने की कोशिश किया गया है.
महाभियोग के अलावा उच्च न्यायालय के जज के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही भी हो सकती है. हालांकि, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का पालन करना होता है . आजतक किसी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को भ्रष्टाचार के लिए दोषी नहीं पाया गया है. उच्च न्यायालय के जजों के ख़िलाफ़ ‘प्रिवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट’ के तहत कार्रवाई हो सकती है. पर, पुलिस ख़ुद से किसी जज के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती. राष्ट्रपति को भारत के चीफ़ जस्टिस की सलाह लेनी होगी और उसके बाद तय करना होगा कि एफआईआर दर्ज हो सकती है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा अपने साल 1991 के फैसले में कहा था, जब मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस के वीरास्वामी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज हुई थी. फिर साल 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ‘इन-हाउस’ प्रक्रिया का गठन किया, जिससे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के ख़िलाफ़ कार्यवाही हो सके. इसमें कहा गया है कि अगर किसी जज के ख़िलाफ़ शिकायत आती है, तो पहले हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस या भारत के चीफ जस्टिस शिकायत की जांच करे.
अगर वो पाते है कि शिकायत सही नहीं है, तो मामला वहीं ख़त्म हो जाता है. अगर ऐसा नहीं होता है तो जिस जज के ख़िलाफ़ शिकायत आई है उससे जवाब मांगा जाता है. अगर जवाब से चीफ़ जस्टिस को लगे कि आगे किसी कार्रवाई की ज़रूरत नहीं है तो मामला ख़त्म हो जाता है. अगर ये लगे कि मामले की और गहरी जाँच होनी चाहिए, तो भारत के चीफ जस्टिस एक कमेटी का गठन कर सकते हैं. इस कमेटी में 3 जज होते हैं. अपनी कार्रवाई के बाद कमेटी या तो जज को बेक़सूर पा सकती है या जज को इस्तीफ़ा देने के लिए कह सकती है. इस्तीफा देने से अगर जज ने मना कर दिया तो समिति उनके इंपीचमेंट के लिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को सूचना दे सकती है. ऐसे भी कुछ मामले हुए हैं जिसमें इन हाउस कमेटी के फ़ैसले के बाद चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया ने केंद्रीय जांच ब्यूरो को हाई कोर्ट जज के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने को कहा है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज एसएन शुक्ला के ख़िलाफ़ 2018 में इन-हाउस कमिटी की प्रक्रिया चली थी. उसके बाद उन्होंने इस्तीफ़ा देने से मना कर दिया. साल 2021 में सीबीआई ने उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों पर एक चार्जशीट दर्ज की. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की पूर्व जज निर्मल यादव के ख़िलाफ़ भी सीबीआई ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं. उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा अभी लंबित है. मार्च 2003 में दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज शमित मुखर्जी को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.