संविधान के साथ धोखाधड़ी

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रामबहादुर राय

सचमुच बहस इसे कहते हैं जो अब छिड़ी है। ‘बहस’ अरबी शब्द है। हिन्दी में खप गया है।लेकिन इसका मतलब अपने–अपने माफिक लोग लगा लेते हैं

संविधान की किसी धारा पर बहस सुप्रीम कोर्ट में नहीं होगी तो कहां होगी। सुलझे और अनुभवी नेतामाने जाते हैं– डॉ. फारुख अब्दुल्ला। वे धमकी दे रहे हैं कि धारा 35ए से छेड़छाड़ हुई तो विद्रोह होजाएगा।

संविधान के किसी भी प्रकांड पंडित से पूछिए कि इस प्रावधान का मतलब क्या है? वह थोड़ी देर तोविस्मित नजरों से आपको देखेगा। कारण यह कि संविधान में 35ए के प्रावधान से वह सर्वथाअपरिचित होगा। ऐसा ही अनुभव मेरा है।

कई साल पहले इस प्रावधान के बारे में लोकसभा के प्रधान महासचिव पद से रिटायर व्यक्ति से जबपूछा तो वे हक्के–बक्के रह गए। संविधान की प्रति सामने रखकर फिर उस प्रावधान को हमनेसमझने का प्रयास किया। अंत में वे बोले कि यह तो संविधान के साथ धोखाधड़ी है। यहां उनका नामसोच समझकर नहीं दे रहा हूं।

ऐसा उन्होंने क्यों कहा? इसे समझ लेने पर कोई भी मानेगा कि इस बहस का मतलब है। बहस कीजरूरत इसलिए है, क्योंकि संविधान में धारा 35ए का उल्लेख नहीं है। उसे खोजना पड़ता है। सिर्फधारा 35 का उल्लेख है।

फिर सवाल उठता है कि 35ए कहां है? इसे संविधान के परिशिष्ट में पा सकते हैं। उसे आदेश, 1954 के शीर्षक में दिया गया है। कानून और संविधान का कोई पंडित भी बहुत आसानी से 35ए को उसमेंखोज नहीं सकता। बहुत माथा–पच्ची करनी होगी।

तब यह सवाल उठता है कि इसे किन परिस्थितियों में चुपके से संविधान में जोड़ने के लिए        परिशिष्टका हिस्सा बनाया गया? खंडन के किसी खतरे के बगैर दो बात कहीं जा सकती है।

पहली यह कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लागू करवाया। यहप्रशासनिक आदेश है। दूसरी बात ज्यादा गंभीर है और इसी अर्थ में संविधान के साथ धोखाधड़ी है किसंसद को तब अंधेरे में रखा गया। इसलिए लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते                                                                                                                              इस धारा के कारण जम्मू–कश्मीर में मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है।  वे लोग नागरिकअधिकार से वंचित हैं, जिन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए।                                     पाकिस्तान से आए हजारों परिवार वहां70 साल से रह रहे हैं। पर वे वहां के नागरिक नहीं हैं।

                              धारा 35ए राज्य सरकार को अधिकार देती है कि वह नागरिकता के बारे
                               में निर्णय अपने विवेक से करे। इस तरह देश में दोहरी नागरिकता
                                    औरनागरिकता में भेदभाव चल रहा है।

ऐसा अन्याय इसलिए संभव है, क्योंकि धारा 35ए राज्य सरकार को अधिकार देती है कि वहनागरिकता के बारे में निर्णय अपने विवेक से करे। इस तरह देश में दोहरी नागरिकता औरनागरिकता में भेदभाव चल रहा है। इसे ही पक्का करने के लिए यह प्रावधान जोड़ा गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बलिदान दिया। वे एक विधान के लिए कुर्बान हुए। उसके बाद ही 14 मई,               1954 को पंडित नेहरू ने यह प्रावधान करवाया।

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई है। जिसे सुनने योग्य मान लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने भीइसे बहसतलब माना है। सही मंच वही है। पिछले महीने 17 जुलाई को एटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर और  डी. वाई. चंद्रचूड़ की पीठ से कहा कि याचिका ने एकअत्यंत संवेदनशील विषय उठाया है। इस पर ‘बड़ी बहस‘ की जरूरत है।

उसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय पीठ को सौंप दिया गया है। यह हुई इसकीभूमिका। बहस तो अब होगी |