लेखक के लेख

सुभाष झा

संवैधानिक चेतना की लहर

  अभी तो सिर्फ शुरुआत ही हुई है। बहुत पहले ही यह हो जाना चाहिए था। आश्चर्य तो इस बात पर है कि किसी प्रधानमंत्री को पहले क्यों नहीं यह सूझा।…

स्वच्छता के जरिये  स्वस्थ भारत की संकल्पना

  हमारे वेदों और पुराणों में जल, पृथ्वी, वायु, आकाश इत्यादि को देवों के रूप में वंदनीय माना गया है। इसी कारण हमने प्रकृति को भी मां का स्थान दिया…

संविधान के साथ धोखाधड़ी

  सचमुच बहस इसे कहते हैं जो अब छिड़ी है। ‘बहस’ अरबी शब्द है। हिन्दी में खप गया है।लेकिन इसका मतलब अपने–अपने माफिक लोग लगा लेते हैं संविधान की किसी धारा पर बहस सुप्रीम कोर्ट में नहीं होगी तो कहां होगी। सुलझे और अनुभवी नेतामाने जाते हैं– डॉ. फारुख अब्दुल्ला। वे धमकी दे रहे हैं कि धारा 35ए से छेड़छाड़ हुई तो विद्रोह होजाएगा। संविधान के किसी भी प्रकांड पंडित से पूछिए कि इस प्रावधान का मतलब क्या है? वह थोड़ी देर तोविस्मित नजरों से आपको देखेगा। कारण यह कि संविधान में 35ए के प्रावधान से वह सर्वथाअपरिचित होगा। ऐसा ही अनुभव मेरा है। कई साल पहले इस प्रावधान के बारे में लोकसभा के प्रधान महासचिव पद से रिटायर व्यक्ति से जबपूछा तो वे हक्के–बक्के रह गए।ऐसा अन्याय इसलिए संभव है, क्योंकि धारा 35ए राज्य सरकार को अधिकार देती है कि वहनागरिकता के बारे में निर्णय अपने विवेक से करे। इस तरह देश में दोहरी नागरिकता औरनागरिकता में भेदभाव चल रहा है। इसे ही पक्का करने के लिए यह प्रावधान जोड़ा गया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बलिदान दिया। वे एक विधान के लिए कुर्बान हुए। उसके बाद ही 14 मई,               1954 को पंडित नेहरू ने यह प्रावधान करवाया। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई है। जिसे सुनने योग्य मान लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने भीइसे बहसतलब माना है। सही मंच वही है। पिछले महीने 17 जुलाई को एटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर और  डी. वाई. चंद्रचूड़ की पीठ से कहा कि याचिका ने एकअत्यंत संवेदनशील विषय उठाया है। इस पर ‘बड़ी बहस‘ की जरूरत है। उसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय पीठ को सौंप दिया गया है। यह हुई इसकीभूमिका। बहस तो अब होगी |              

चुनौती नदी बचाने की

  सद्गुरु जग्गी वासुदेव का नदी अभियान विनोबा के भूदान आंदोलन सरीखा है। विनोबा ने तब के सबसे बड़े सवाल पर जनमत जगाया। वैसे ही आज सबसे बड़ी चुनौती नदी…

यूरोप में जनसंख्या और समृद्धि

  पिछली लगभग आधी शताब्दी तक पश्चिम के अर्थशास्त्री गैर-यूरोपीय देशों को यह समझाते रहे हैं कि उनकी गरीबी का कारण उनकी जनसंख्या में हुई अपूर्व वृद्धि है। गैर-यूरोपीय देशों…

रेत की दीवार पर खड़ा महल

  आज यूरोप और अमेरिकी अर्थव्यवस्थाएं ढलान पर हैं। 1970 में समृद्धि का शिखर छू लेने के बाद उनकी आंतरिक ऊर्जा चुक गई सी लगती है। पिछले कई दशक से…

खेती किसानी की भारतीय बादशाहत को किसकी नजर लगी

पौधों और वनस्पति की दुनिया में काम करने वाले जानते हैं कि 16 वीं सदी में पुर्तगाली गार्सिया डि ओर्टा ने पौधों की विभिन्न प्रजातियों के बारे में एक स्थानीय…

गणेश और आधुनिक बुद्धिजीवी

मुझे लगता है कि यदि मैं ‘बौद्ध धर्म और आधुनिक बौद्धिकता’ पर कुछ कहता तो अधिकांश लोग गौर नहीं करते। लेकिन गणेश? मुझे हमेशा ही या तो गहरी निराशा या…

विपक्ष-विरोध-विसम्मति – गोपाल कृष्ण गांधी

चुनावों के दस्तावेजों को देखे, तो पहले निर्दलीय या स्वतंत्र उम्मीदवारों की बडी संख्या होती, उसमें से कई जीत भी जाते थे। स्वतंत्र पार्टी करके जब पार्टी शुरू हुई तो…

शिक्षक जितना सुयोग्य ,शिक्षा उतनी ही सार्थक

  प्रत्येक कक्षा में विद्यार्थियों को मिलने वाले ज्ञान यानी लर्निंग आउटकम की बात तो खूब होती थी, लेकिन उसकी व्याख्या कभी नहीं हो पाई। हमारी सरकार ने यह काम…

अब डराते नही लुभाते हैं जंगल

अभी चंद वर्षों पहले तक जो हाथ नक्सलियों की कंगारू कोर्ट में सरेआम तड़प कर मरने से बचने या अपने परिवारों की महिला सदस्यों से बलात्कार होते देख जां-बक्शी की…

यूरोप की शिक्षा का स्वरूप

  आज यह बात सर्वमान्य लगती है कि पिछली लगभग एक शताब्दी में यूरोपीय शिक्षा का जो स्वरूप उभर कर आया है, वह सबके लिए उपादेय है। आप अगर भौतिक…