लेखक के लेख

प्रदीप कौर आर्या

समय के साथ बदले सहकारिता के कायदे कानून

चौथी पंचवर्षीय योजना ने सहकारी समितियों के पुनर्गठन को प्राथमिकता दी। इसका उद्देश्य था अल्पकालीन और मध्यकालीन सहकारी संरचना को व्यवहारिक बनाना। इस पंचवर्षीय योजना का समय साल 1969 से…

हरित क्रांति से आगे अब परंपरागत खेती की ओर लौटना होगा

अब समय है परंपरागत खेती के तरीको की तरफ लौटने का, लेकिन इसमें भी संतुलन की जरूरत है। क्योंकि जितने अन्न की जरूरत हमे होगी वह अकेले जैविक खेती से…

हरित क्रांति के सबक

ब्रिटिश हूकूमत से पहले भारत में खेती भारतीय जीवन शैली का परंपरागत अंग था।पशुपालन भी खेती किसानी का हिस्सा था। खेती स्वतंत्र एवं जीवन-निर्वाहक प्रकृति की थी। किसान स्वतंत्र थे,…

प्रकृति के आधार पर प्रकृति को देखो – वसुंधरा दिवस पर विशेष

वसंधुरा - जैसा कि नाम से वर्णित है-वसु जिसमें वास है! यह पंच भौतिक तत्व-मिट्टी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि से मिलकर बनी है! आधुनिकीकरण-भौतिकतावाद के भूलभुलैया में फंसकर हमने…

अपना गांव, अपनी दुनिया

भारत कृषि प्रधान गांवों का देश है और गांव का इतिहास मानव सभ्यता के विकास का इतिहास रहा है। गांव परिवारों या व्यक्तियों का समूह मात्र नहीं है। विभिन्न ऐतिहासिक…

कोरोना से कराहता चीन और सुनहरे भविष्य की ओर भारत

विश्व विरादरी में चीन घिरता जा रहा है। उसके अपने कारनामें धीरे-धीरे बाहर आ रहे हैं। जिस कोरोना से पूरी दुनिया परेशान है उसे चीन की चाल समझी जा रही…

खेती में आधुनिक और परंपरागत तकनीक का संतुलन जरूरी

भारत में ब्रिटिश शासन आने से पहले, खेती भारती जीवन-शैली का परंपरागत अभिन्न अंग थी। पशुपालन भी खेती किसानी का हिस्सा था। खेती स्वतंत्र एवं जीवन-निर्वाहक प्रकृति की थी। किसान…

हरित क्रांति – क्या पाया, क्या खोया?

भारत में हरित क्रांन्ति की शुरुआत सन 1966-67 से हुई। इसकी शुरूआत का श्रेय नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर नारमन बोरलॉग को जाता है। हरित क्रांन्ति का उद्देश्य अन्न उत्पादन को…