लेखक के लेख

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बोहरा मुसलमान और मोदी

शांत सरोवर में ‘कमल’ खिलता है। जो परिवार, समाज और देश अशांत है, वहां विकास की बदरंग तस्वीरे है। अल्पसंख्यकों के बीच बोहरा समुदाय अपनीखास विशिष्टताओं से भरा है। उनके आस्था का केंद्र ‘गुरूतत्व’ है। इसी गुरूतत्व की रोशनी से बोहरा मुसलमान खुद को भासित करते है। ये अशांत नहींबल्कि शांत है और शांत सरोवर में समृद्धि के कमल हर उस जगह खिले हुए है, जहां पर बोहरा समुदाय की बसावट हैइंदौर में बोहरा समाज के कार्यक्रम मेंप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहुंचे तो सियासी गलियारे में नाहक चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया। लेकिन वहां कार्यक्रम में शरीक होकर नरेंद्र मोदी ने यह जता दिया किवे लकीर के फकीर नहीं है, बल्कि नई-नई लकीरों को निर्मित करने का साहस भी रखते हैवे खुद बेचैन तो नहीं होते है लेकिन यह बात दीगर है कि उनकेकदम से दूसरे लोग बेचैनी में जरूर पहुंच जाते है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंदौर में बोहरा समाज के कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंचे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। यह दूसरा मौका है जब नरेंद्र मोदी बोहरा मुस्लिमोंके कार्यक्रम में पहुंचे थे। इससे पहले जब वह गुजरात के सीएम थे तो बोहरा समाज के कार्यक्रम में गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्बोधन के दौरान बोहरासमुदाय से अपने रिश्ते को खास तौर से रेखांकित किया। कहा कि ‘बोहरा समाज से उनका गहरा रिश्ता है।’ गौरतलब है कि पीएम को बोहरा मुस्लिम समुदायसे समर्थन मिलता रहा है। दाऊदी बोहरा अपने विशिष्ट सफेद कुर्ता और सफेद टोपी के साथ पिछले कुछ वर्षो में विभिन्न मौकों पर मोदी के साथ चित्रखिंचवाते देखे गए है। अल्पसंख्यकों में नरेंद्र मोदी के प्रति जो हिचक है, उस हिचक को बोहरा समाज गाहे-बगाहे तोड़ता रहा है। जानकारी के अनुसार मोदी केआस्ट्रेलिया दौरे के दौरान सिडनी में पीएम के संबोधन मे भाग लेने वाले हजारो लोगों में से सौ के करीब बोहरा समुदाय के लोग भी थे। इन्हें आस्ट्रेलिया मेंभारतीय उच्चायोग की ओर से विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। सिडनी में बोहराओं ने पारंपरिक पोशाक पहन रखे थे। दाऊदी बोहरा मुसलमान फातिमी इमामों से जुड़े है जो पैगंबर मोहम्म्द के वंशज माने जाते है। १० वीं से १२ वीं शताब्दी के दौरान इस्लामी दुनिया मे इनकामहत्वपूर्ण स्थान था। बोहरा गुजराती शब्द ‘ वहौरुउ ‘ अर्थात व्यापार का अपभ्रंश है। ११ वीं शताब्दी में उत्तरी मिश्र से धर्मप्रचारकों के माध्यम से भारत मेंइस्लाम की यह विचारधारा भारत मे दाख़िल हुई। १५३९ के बाद जब भारतीय समुदाय बड़ा हो गया तो इन लोगों का मुख्यालय यमन से भारत के सिद्धपुर मेहो गया। १५८८ में दाऊद बिन कुतुब शाह और सुलेमान के अनुयायियों के बीच बटवारा हो गया। आज सुलेमानियों के प्रमुख यमन में रहते है जबकि सबसेअधिक तादात में होने के कारण दाऊदी बोहराओं का मुख्यालय मुंबई में है। १९६० के दशक में नौमान अली ने दाऊदी बोहरा समुदाय में सुधारवादी आंदोलन की शुरुआत की। इन्हें ‘कांट्रेक्टर ‘ भी कहा जाता था। उनके दौर में यहआंदोलन बहुत जोर नहीं पकड़ पाया, लेकिन नौमान अली के निधन के बाद आंदोलन की कमान १९८० के दशक में डा. असगर अली इंजीनियर के हाथो में आगई और उसके बाद आंदोलन का तेजी के साथ विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार हुआ। इंजीनियर ने उन देशों का दौरा भी किया, जहां दाऊदी बोहरा बसे हैं। उन्होंनेकवियों, कलाकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, पूर्व न्यायधीशों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी अपने आंदोलन से जोड़ा लेकिन उनकी मौत के बाद आंदोलनकी तपिश ठंडी पड़ गई।

विपक्षी राजनीति की दिशा

  आम चुनाव आते ही भारतीय राजनीति दलीय समर में बदल जाती है। अगले वर्ष आम चुनाव होने हैं और उसके लिए अभी से राजनैतिक समर आरंभ हो चुका है।…

संवैधानिक चेतना की लहर

  अभी तो सिर्फ शुरुआत ही हुई है। बहुत पहले ही यह हो जाना चाहिए था। आश्चर्य तो इस बात पर है कि किसी प्रधानमंत्री को पहले क्यों नहीं यह सूझा।…

स्वच्छता के जरिये  स्वस्थ भारत की संकल्पना

  हमारे वेदों और पुराणों में जल, पृथ्वी, वायु, आकाश इत्यादि को देवों के रूप में वंदनीय माना गया है। इसी कारण हमने प्रकृति को भी मां का स्थान दिया…

संविधान के साथ धोखाधड़ी

  सचमुच बहस इसे कहते हैं जो अब छिड़ी है। ‘बहस’ अरबी शब्द है। हिन्दी में खप गया है।लेकिन इसका मतलब अपने–अपने माफिक लोग लगा लेते हैं संविधान की किसी धारा पर बहस सुप्रीम कोर्ट में नहीं होगी तो कहां होगी। सुलझे और अनुभवी नेतामाने जाते हैं– डॉ. फारुख अब्दुल्ला। वे धमकी दे रहे हैं कि धारा 35ए से छेड़छाड़ हुई तो विद्रोह होजाएगा। संविधान के किसी भी प्रकांड पंडित से पूछिए कि इस प्रावधान का मतलब क्या है? वह थोड़ी देर तोविस्मित नजरों से आपको देखेगा। कारण यह कि संविधान में 35ए के प्रावधान से वह सर्वथाअपरिचित होगा। ऐसा ही अनुभव मेरा है। कई साल पहले इस प्रावधान के बारे में लोकसभा के प्रधान महासचिव पद से रिटायर व्यक्ति से जबपूछा तो वे हक्के–बक्के रह गए।ऐसा अन्याय इसलिए संभव है, क्योंकि धारा 35ए राज्य सरकार को अधिकार देती है कि वहनागरिकता के बारे में निर्णय अपने विवेक से करे। इस तरह देश में दोहरी नागरिकता औरनागरिकता में भेदभाव चल रहा है। इसे ही पक्का करने के लिए यह प्रावधान जोड़ा गया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बलिदान दिया। वे एक विधान के लिए कुर्बान हुए। उसके बाद ही 14 मई,               1954 को पंडित नेहरू ने यह प्रावधान करवाया। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई है। जिसे सुनने योग्य मान लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने भीइसे बहसतलब माना है। सही मंच वही है। पिछले महीने 17 जुलाई को एटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर और  डी. वाई. चंद्रचूड़ की पीठ से कहा कि याचिका ने एकअत्यंत संवेदनशील विषय उठाया है। इस पर ‘बड़ी बहस‘ की जरूरत है। उसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय पीठ को सौंप दिया गया है। यह हुई इसकीभूमिका। बहस तो अब होगी |              

लोकहित का अखबारी घराना क्यों बना नवसाम्राज्यवाद का वाहक – इतिहास जनसत्ता का

  रामनाथ गोयनका के निधन से इंडियन एक्सप्रेस समूह पर ग्रहण लग गया। ऐसा हो ही नहीं सकता था कि जनसत्ता उससे अछूता रहे। उनके जीते जी उत्तराधिकार का फैंसला…

चुनौती नदी बचाने की

  सद्गुरु जग्गी वासुदेव का नदी अभियान विनोबा के भूदान आंदोलन सरीखा है। विनोबा ने तब के सबसे बड़े सवाल पर जनमत जगाया। वैसे ही आज सबसे बड़ी चुनौती नदी…

यूरोप का विध्वंसक सिविलाइजेशन

महात्मा गांधी से जब यूरोपीय सभ्यता के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने इसकी खिल्ली उड़ाई थी। भारतीय दृष्टि से सभ्यता का आधार नैतिक होता है। उसके लिए हमारे…

जब प्रभाष जोशी पर हमला हुआ, गुरूमूर्ती गिरफ्तार हुए और तेजाबी हमले मे प्रदीप सिंह और संजय सिंह झुलसे – इतिहास जनसत्ता का

कुछ दिनों बाद बोफोर्स तोप सौदे का मामला स्वीडन रेडियो की खबर से सामने आया। यही तब भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा मुदद बना। जनसत्ता की उस आंदोलन में एक खास…

जब सरकार ने रिलायंस की हलक से निकाल लिया बैंकों से लिया कर्ज – इतिहास जनसत्ता का

उस समय भी रिलायंस ने सरकार में कितनी गहरी सुरंग बिछा ली थी यह जानने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह की पुस्तक ‘मंजिल से ज्यादा सफर’ का यह अंश पढ़ें…

लेकर रहेंगे आजादी, आखिर ले ही ली आजादी, 377 से…

पानी गिर रहा था। बहुत पानी गिर रहा था। बारिश की ये बूंदे उनके आंनद को चरम की ओर ले जा रही थी। ये ‘नई उम्र की नई फसल’ थी । ‘खाए-पीए-अघाए’ जैसे लोग…

उत्सव है या हिंदी का ‘श्राद्ध-पक्ष’!

हिंदी को हिंद के माथे की बिंदी होनी चाहिए थी। क्या माथे की बिंदी बन पाई? सवाल का जवाब नैराश्य भरा है। बिंदी नहीं बन पाई। जिसे मालकिन बनना था,…