लेखक के लेख

उमेश सिंह

अयोध्या की महिमा गाती, पुस्तक ‘अहो! अयोध्या’

अयोध्या भूमि में आकर्षण है। आज नहीं आदि से। यहां शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है। साधक, श्रद्धालु भक्त के साथ देवता भी यहां वास करना चाहते हैं। भारतीय अध्यात्म…

. मै अयोध्या हूँ …..

  मै अयोध्या सिर्फ शब्द भर नहीं हूँ , शब्दब्रह्म हूं। कमोबेश व्यापक,व्यापक , अखंड और अनंत जैसी स्थिति मे हूँ। संस्कृति की शिला पर मै हर युग मे स्वर्णिम…

गीता में हम उस सत्य को ढूंढ़ते हैं जो सनातन है, शास्वत है

गीता का विचार करते समय हम उस सत्य को ढूंढ़ते हैं, जो सनातन है। जिससे अन्य सभी सत्य पैदा होते हैं। इसी कारण वह परम-सत्य किसी एक पैने सूत्र के…

भावी पीढ़ी की सांसों को विराम दे रहा अनैतिक विकास

  बुनियादी तौर पर विकास दो आयामों में अभिव्यक्त होता है, एक तो भौतिक दूसरे चेतनागत। जब विकास की इन दोनों परिभाषाओं में अनुलोम सम्बन्ध होता है तो मानव सभ्यता…

‘राजमार्गों के शिल्पी’ की आंखों में अब रच बस रहा जलमार्ग 

साइकिल पैरों के गति का विस्तार है। जहाज कदमों के अधिकतम तीव्र गति का विस्तार है।एक दौर वह भी था ,जब देश विलंबित गति से चल रहा था। अब एक ऐसे दौर में भी देश पहुंच गया है , जहां राजमार्गों का संजाल बिछा हुआ है। विलंबित गतिसे चल रहे देश के पैरों को तीव्र गति देने में नितिन गडकरी की महती भूमिका रही है। ‘ राजमार्गों के शिल्पी ‘ नितिन गडकरी की आंखों में अब विशालसंभावनाओं वाली सदानीरा नदियां रच बस रही हैं। इन नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित कर समूचे देश में बड़े पैमाने पर विकास के काम चल रहे हैं। इसीकड़ी में सोमवार को वाराणसी में जल मार्ग से कंटेनर कार्गो की व्यावसायिक चहल कदमी दिखी। प्राचीन देश ने वह स्वर्णिम दौर भी देखा है , जब उसकेउत्पाद इन्हीं नदियों के जरिए समूची दुनिया मे पहुँचे। फिर देश उसी दिशा की ओर जा रहा है, जिस दिशा में चल कर उसने अतीत में स्वर्णिम बुलंदियों कोहासिल किया था। ग़ौरतलब है कि गंगा पर 5370 करोड़ की लागत से जलमार्ग बनाने का काम किया जा रहा है। गंगा में हो रहा यह काम अब दिखने लगा है। वाराणसी इसकासटीक उदाहरणहै।200 करोड की लागत से 2016 में काम शुरू हुआ। इसी जेटृी पर सोमवार को कंटेनर कार्गों का आगमन हुआ है। यहाँ से 13 लाख टन सामानकी हर साल ढुलाई हो सकेगी।

 ‘हिंदुत्व की मथनी’ बनी अयोध्या

त्रेतायुग के बाद पिछले बरस की तरह इस बार भी दीवाली ऐसी रही कि अयोध्या निहाल हो उठी। इतिहास करवट ले रहा था। काल का पहिया घूम गया। पहुंच गया दीवाली…

फुटपाथ पर बिकते शर्मा और शुक्ल के ‘सप्रेंम भेंट’

दृश्य-एक। ‘युद्ध में अयोध्या’ व ‘अयोध्या का चश्मदीद’ के लेखक व चर्चित पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘तमाशा मेरे आगे’ को ३० दिसंबर २०१४ को लार्ड मोहन सहाय को…

सियासत से एक सवाल है क्या वह राम बनने को तैयार है?

यह सत्ता के भगवा रंग का प्रताप है। एक सन्यासी के सिंहासन पर बैठने का परिणाम है। सांस्कृतिक प्रतीकों के मानो पुनरुत्थान के युग की आहट सूबे मे चहुँओर है,…

अयोध्या के विकास को लगे पंख

अयोध्या धर्म और सियासत दोनो के केन्द्र में सदियों से रहा। कई सियासी दलों की सियासत को तो परवान पर ही अयोध्या ने चढ़ाया। अयोध्या का मतलब ही होता है…

आधुनिक युग के विश्वामित्र हैं नितिन गडकरी !

त्रेतायुग के विश्वामित्र ने अयोध्या को जनकपुर से मिलाया। अयोध्या और जनकपुर के बीच संबंधों की डोर बांधी। मर्यादा पुरुषोत्तम राम और जानकी माता जिस मार्ग से आए, उस राम-जानकी…

बोहरा मुसलमान और मोदी

शांत सरोवर में ‘कमल’ खिलता है। जो परिवार, समाज और देश अशांत है, वहां विकास की बदरंग तस्वीरे है। अल्पसंख्यकों के बीच बोहरा समुदाय अपनीखास विशिष्टताओं से भरा है। उनके आस्था का केंद्र ‘गुरूतत्व’ है। इसी गुरूतत्व की रोशनी से बोहरा मुसलमान खुद को भासित करते है। ये अशांत नहींबल्कि शांत है और शांत सरोवर में समृद्धि के कमल हर उस जगह खिले हुए है, जहां पर बोहरा समुदाय की बसावट हैइंदौर में बोहरा समाज के कार्यक्रम मेंप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहुंचे तो सियासी गलियारे में नाहक चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया। लेकिन वहां कार्यक्रम में शरीक होकर नरेंद्र मोदी ने यह जता दिया किवे लकीर के फकीर नहीं है, बल्कि नई-नई लकीरों को निर्मित करने का साहस भी रखते हैवे खुद बेचैन तो नहीं होते है लेकिन यह बात दीगर है कि उनकेकदम से दूसरे लोग बेचैनी में जरूर पहुंच जाते है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंदौर में बोहरा समाज के कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंचे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। यह दूसरा मौका है जब नरेंद्र मोदी बोहरा मुस्लिमोंके कार्यक्रम में पहुंचे थे। इससे पहले जब वह गुजरात के सीएम थे तो बोहरा समाज के कार्यक्रम में गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्बोधन के दौरान बोहरासमुदाय से अपने रिश्ते को खास तौर से रेखांकित किया। कहा कि ‘बोहरा समाज से उनका गहरा रिश्ता है।’ गौरतलब है कि पीएम को बोहरा मुस्लिम समुदायसे समर्थन मिलता रहा है। दाऊदी बोहरा अपने विशिष्ट सफेद कुर्ता और सफेद टोपी के साथ पिछले कुछ वर्षो में विभिन्न मौकों पर मोदी के साथ चित्रखिंचवाते देखे गए है। अल्पसंख्यकों में नरेंद्र मोदी के प्रति जो हिचक है, उस हिचक को बोहरा समाज गाहे-बगाहे तोड़ता रहा है। जानकारी के अनुसार मोदी केआस्ट्रेलिया दौरे के दौरान सिडनी में पीएम के संबोधन मे भाग लेने वाले हजारो लोगों में से सौ के करीब बोहरा समुदाय के लोग भी थे। इन्हें आस्ट्रेलिया मेंभारतीय उच्चायोग की ओर से विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। सिडनी में बोहराओं ने पारंपरिक पोशाक पहन रखे थे। दाऊदी बोहरा मुसलमान फातिमी इमामों से जुड़े है जो पैगंबर मोहम्म्द के वंशज माने जाते है। १० वीं से १२ वीं शताब्दी के दौरान इस्लामी दुनिया मे इनकामहत्वपूर्ण स्थान था। बोहरा गुजराती शब्द ‘ वहौरुउ ‘ अर्थात व्यापार का अपभ्रंश है। ११ वीं शताब्दी में उत्तरी मिश्र से धर्मप्रचारकों के माध्यम से भारत मेंइस्लाम की यह विचारधारा भारत मे दाख़िल हुई। १५३९ के बाद जब भारतीय समुदाय बड़ा हो गया तो इन लोगों का मुख्यालय यमन से भारत के सिद्धपुर मेहो गया। १५८८ में दाऊद बिन कुतुब शाह और सुलेमान के अनुयायियों के बीच बटवारा हो गया। आज सुलेमानियों के प्रमुख यमन में रहते है जबकि सबसेअधिक तादात में होने के कारण दाऊदी बोहराओं का मुख्यालय मुंबई में है। १९६० के दशक में नौमान अली ने दाऊदी बोहरा समुदाय में सुधारवादी आंदोलन की शुरुआत की। इन्हें ‘कांट्रेक्टर ‘ भी कहा जाता था। उनके दौर में यहआंदोलन बहुत जोर नहीं पकड़ पाया, लेकिन नौमान अली के निधन के बाद आंदोलन की कमान १९८० के दशक में डा. असगर अली इंजीनियर के हाथो में आगई और उसके बाद आंदोलन का तेजी के साथ विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार हुआ। इंजीनियर ने उन देशों का दौरा भी किया, जहां दाऊदी बोहरा बसे हैं। उन्होंनेकवियों, कलाकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, पूर्व न्यायधीशों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी अपने आंदोलन से जोड़ा लेकिन उनकी मौत के बाद आंदोलनकी तपिश ठंडी पड़ गई।