विषय संग्रह

संविधान

संविधान सभा का पहला दिन

आस्ट्रेलिया से मिले शुभकामना संदेशों को पढ़कर सुनाया। इसके अलावा उन्हें दो काम उस दिन करने थे। पहला, एक विवाद पर व्यवस्था देनी थी। ब्रिटिश बलूचिस्तान के खान अब्दुस्समद खां…

था वह ऐतिहासिक क्षण

अध्यक्ष के आसन पर बैठने की बारी अब डॉ. राजेंद्र प्रसाद की थी। बधाई भाषण के क्रम में ‘भारत-कोकिला और बुलबुले हिन्द’ सरोजिनी नायडू का भाषण जैसे ही समाप्त हुआ…

मुस्लिम लीग की प्रेत बाधा

  मुस्लिम लीग की अनुपस्थिति संविधान सभा पर अंत तक छाई रही। इस तरह मानो संविधान सभा पर मुस्लिम लीग की प्रेत बाधा मंडरा रही हो। उससे चाहते हुए भी…

बदलाव का हर पीढ़ी को अधिकार

  संविधान के लक्ष्य का प्रस्ताव ‘सभी सदस्यों ने खड़े होकर स्वीकार किया।’ यह 22 जनवरी, 1947 की ऐतिहासिक घटना है। उसी से संविधान सभा को वैधानिक और आत्मिक बल मिला।…

चेतावनी जो सही निकली

  संविधान सभा के पांचवें दिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव रखा। वे चाहते थे कि उसे संविधान सभा बिना बहस के पारित कर दे। वैसा हुआ…

एक रहस्य जो उजागर हुआ

  लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पर संविधान सभा ने डा. भीमराव अंबेडकर का भाषण दत्तचित्त होकर सुना। इसकी पुष्टि अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद की एक टिप्पणी से होती है। जो संविधान…

आधुनिक जीवन का आधार राष्ट्रीयता है!

  संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू के लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पर दूसरे चरण की बहस महीने भर बाद फिर से शुरू हुई। इस अवधि में मुस्लिम लीग की प्रतीक्षा…

संवैधानिक चेतना की लहर

  अभी तो सिर्फ शुरुआत ही हुई है। बहुत पहले ही यह हो जाना चाहिए था। आश्चर्य तो इस बात पर है कि किसी प्रधानमंत्री को पहले क्यों नहीं यह सूझा।…

संविधान के साथ धोखाधड़ी

  सचमुच बहस इसे कहते हैं जो अब छिड़ी है। ‘बहस’ अरबी शब्द है। हिन्दी में खप गया है।लेकिन इसका मतलब अपने–अपने माफिक लोग लगा लेते हैं संविधान की किसी धारा पर बहस सुप्रीम कोर्ट में नहीं होगी तो कहां होगी। सुलझे और अनुभवी नेतामाने जाते हैं– डॉ. फारुख अब्दुल्ला। वे धमकी दे रहे हैं कि धारा 35ए से छेड़छाड़ हुई तो विद्रोह होजाएगा। संविधान के किसी भी प्रकांड पंडित से पूछिए कि इस प्रावधान का मतलब क्या है? वह थोड़ी देर तोविस्मित नजरों से आपको देखेगा। कारण यह कि संविधान में 35ए के प्रावधान से वह सर्वथाअपरिचित होगा। ऐसा ही अनुभव मेरा है। कई साल पहले इस प्रावधान के बारे में लोकसभा के प्रधान महासचिव पद से रिटायर व्यक्ति से जबपूछा तो वे हक्के–बक्के रह गए।ऐसा अन्याय इसलिए संभव है, क्योंकि धारा 35ए राज्य सरकार को अधिकार देती है कि वहनागरिकता के बारे में निर्णय अपने विवेक से करे। इस तरह देश में दोहरी नागरिकता औरनागरिकता में भेदभाव चल रहा है। इसे ही पक्का करने के लिए यह प्रावधान जोड़ा गया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बलिदान दिया। वे एक विधान के लिए कुर्बान हुए। उसके बाद ही 14 मई,               1954 को पंडित नेहरू ने यह प्रावधान करवाया। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई है। जिसे सुनने योग्य मान लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने भीइसे बहसतलब माना है। सही मंच वही है। पिछले महीने 17 जुलाई को एटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर और  डी. वाई. चंद्रचूड़ की पीठ से कहा कि याचिका ने एकअत्यंत संवेदनशील विषय उठाया है। इस पर ‘बड़ी बहस‘ की जरूरत है। उसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय पीठ को सौंप दिया गया है। यह हुई इसकीभूमिका। बहस तो अब होगी |